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IDFC First Bank Fraud Case: ₹590 करोड़ की गड़बड़ी ने बैंकिंग भरोसे पर उठाए सवाल

IDFC First Bank Fraud Case IDFC First Bank Fraud Case

हाल ही में Haryana Government से जुड़े कुछ बैंक खातों में अनऑथराइज्ड ट्रांजैक्शन्स का मामला सामने आने के बाद निजी क्षेत्र के बैंकिंग सेक्टर में हलचल मच गई है। लगभग तीन दिन पहले बैंक ने खुलासा किया कि चंडीगढ़ की एक शाखा से ऑपरेट हो रहे सरकारी खातों में करीब ₹590 करोड़ का बैलेंस मिसमैच पाया गया। इस खुलासे के बाद बैंक के शेयर पर भारी दबाव आया और एक ही दिन में बैंक का मार्केट कैप 20% से अधिक गिर गया—जो कोविड के बाद सबसे बड़ी सिंगल-डे गिरावट मानी जा रही है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह भरोसे पर आधारित होता है, और इस तरह की घटनाएं सीधे बैंक की साख पर असर डालती हैं।


क्या हुआ पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग एक महीने पहले हरियाणा सरकार के एक विभाग ने अपना बैंक खाता बंद कर फंड दूसरे बैंक में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान बैलेंस रिकंसिलिएशन में अंतर पाया गया। इसके बाद अन्य सरकारी विभागों ने भी अपने खातों की जांच की, जहां समान अंतर सामने आया।

जांच में पता चला कि:

  • सभी खाते चंडीगढ़ की एक ही शाखा से जुड़े थे
  • कुल ₹590 करोड़ का अंतर पाया गया
  • लगभग ₹490 करोड़ रिकंसिलिएशन के दौरान ट्रेस कर लिए गए
  • शेष ₹100 करोड़ के लिए बैंक ने प्रोविजन बना लिया

कैसे हुआ फ्रॉड?

बैंक के अनुसार यह कोई साइबर हैक नहीं था, बल्कि पारंपरिक बैंकिंग धोखाधड़ी का मामला था।
बताया गया कि नकली चेक और फर्जी ऑथराइजेशन लेटर्स के जरिए फंड ट्रांसफर किए गए।

सामान्यतः बैंकिंग में Maker–Checker–Authorizer प्रक्रिया लागू होती है, लेकिन इस मामले में:

  • कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत की आशंका
  • नकली डेबिट इंस्ट्रक्शन्स पास किए गए
  • फंड बाहरी खातों में ट्रांसफर हुए

चार संदिग्ध कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया है।


जांच और कार्रवाई

बैंक ने मामले की जांच के लिए:

  • KPMG से फॉरेंसिक ऑडिट शुरू कराया
  • पुलिस शिकायत दर्ज कराई
  • संदिग्ध खातों को फ्रीज कराने के लिए अन्य बैंकों से संपर्क किया

साथ ही बैंक ने स्पष्ट किया कि सीनियर मैनेजमेंट इस मामले में शामिल नहीं है।


सरकारी प्रतिक्रिया

हरियाणा सरकार के वित्त विभाग ने एक नोटिस जारी कर:

  • IDFC First Bank
  • AU Small Finance Bank

को अस्थायी रूप से सरकारी लेनदेन पैनल से हटा दिया।

इसका मतलब है कि फिलहाल राज्य की कोई भी सरकारी इकाई इन बैंकों में नया फंड पार्क नहीं करेगी।


बैंक पर वित्तीय असर कितना?

हालांकि ₹590 करोड़ की राशि बड़ी है, लेकिन बैंक के आकार की तुलना में इसका प्रभाव सीमित माना जा रहा है:

  • नेटवर्थ: लगभग ₹46,000 करोड़
  • कुल डिपॉजिट: लगभग ₹2.8 लाख करोड़
  • सरकारी डिपॉजिट: कुल का 1% से भी कम

फिर भी यह रकम बैंक के हालिया तिमाही लाभ से काफी अधिक है, जिससे अल्पकालिक प्रॉफिट पर असर पड़ सकता है।


बाजार ने इतनी तेज प्रतिक्रिया क्यों दी?

इस गिरावट का मुख्य कारण वित्तीय नुकसान नहीं बल्कि गवर्नेंस रिस्क है।
बैंकिंग सेक्टर में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है, और जब सरकारी खातों से जुड़ा मामला सामने आता है तो निवेशक ज्यादा संवेदनशील प्रतिक्रिया देते हैं।


डिजिटल बैंकिंग के बावजूद फ्रॉड कैसे हुआ?

यह मामला एक महत्वपूर्ण बात उजागर करता है—
भले ही बैंक डिजिटल सिस्टम्स में मजबूत हो, लेकिन फिजिकल इंस्ट्रूमेंट्स (जैसे चेक) अभी भी जोखिम पैदा कर सकते हैं।

बैंक अब:

  • AI आधारित सिग्नेचर वेरिफिकेशन
  • हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन्स के लिए अतिरिक्त अलर्ट
  • डबल कन्फर्मेशन सिस्टम

जैसे उपाय लागू करने की योजना बना रहा है।


इंडस्ट्री पर असर

यह घटना पूरे बैंकिंग सेक्टर के लिए एक चेतावनी है।
हालांकि बड़े निजी बैंक जैसे HDFC Bank और ICICI Bank मजबूत कंट्रोल सिस्टम्स के कारण अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन मिड-साइज बैंकों को अब अधिक जांच का सामना करना पड़ सकता है।


निष्कर्ष

IDFC फर्स्ट बैंक के लिए यह मामला वित्तीय से ज्यादा प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।
फ्रॉड की राशि बैंक के आकार के मुकाबले बड़ी नहीं है, लेकिन भरोसे को फिर से मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आने वाले महीनों में रिकवरी, फॉरेंसिक रिपोर्ट और कंट्रोल सिस्टम्स में सुधार इस केस की दिशा तय करेंगे।

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