फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में रिसर्च और डेवलपमेंट के दौरान फेलियर नॉर्मल हैं। कई बार ये Failure ही सक्सेस की राह दिखाते हैं। लेकिन एक बार दवा मार्केट में आ जाए तो उसमें फेलियर बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। दुर्भाग्य से भारत में ऐसा बार-बार हो रहा है।
पिछले साल अक्टूबर में मध्य प्रदेश में 20 से ज्यादा बच्चों की मौत कंटैमिनेटेड कफ सिरप से हुई। 2022 में गांबिया में 66 बच्चों की जान भी इंडियन ओरिजिन कफ सिरप से जुड़ी थी। हाल की एकेडमिक स्टडीज में पाया गया कि भारत से एक्सपोर्ट होने वाली कई कैंसर दवाएं क्वालिटी टेस्ट में फेल हो रही हैं।
दुनिया का “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहलाने वाला देश ऐसी घटनाओं से कैसे जूझ रहा है? आज हम भारत के ड्रग टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोरियों को समझेंगे – रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से लेकर एक्सिपिएंट्स की समस्या और सिस्टम में जरूरी बदलाव तक।
भारत का ड्रग टेस्टिंग रेगुलेटरी फ्रेमवर्क: जटिल और कमजोर
भारत में दवाओं की क्वालिटी दो मुख्य बॉडीज गवर्न करती हैं:
- सीडीएससीओ (Central Drugs Standard Control Organisation) – नेशनल लेवल पर स्टैंडर्ड सेट करती है।
- आईपीसी (Indian Pharmacopoeia Commission) – सीडीएससीओ के साथ मिलकर ड्रग स्टैंडर्ड तय करती है।
सीडीएससीओ नए ड्रग्स को 4 साल के लिए मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस देती है। लेकिन डे-टू-डे इनफोर्समेंट स्टेट्स के हाथ में है। हर राज्य का अपना फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) होता है जो फैक्ट्री इंस्पेक्शन और सैंपल टेस्टिंग करता है। 4 साल बाद लाइसेंस रिन्यू या रिवोक करने का अधिकार भी उसी राज्य के पास होता है।
थ्योरी में यह डिसेंट्रलाइजेशन अच्छा लगता है – लोकल लेवल पर क्लोज मॉनिटरिंग। लेकिन हकीकत अलग है।
- ज्यादातर स्टेट FDA अंडरस्टाफ्ड और ओवरवर्क्ड हैं।
- 2012 की एक संसदीय कमेटी रिपोर्ट के अनुसार भारत को 3200 ड्रग इंस्पेक्टर्स चाहिए थे, लेकिन सिर्फ 846 थे।
- महाराष्ट्र जैसे बड़े फार्मा क्लस्टर में भी पिछले साल 77% इंस्पेक्टर शॉर्टफॉल था।
एक इंस्पेक्टर को कई फैक्ट्रियों देखनी पड़ती हैं। नतीजा – छोटी यूनिट्स सालों बिना इंस्पेक्शन चलती रहती हैं।
ड्रग टेस्टिंग लैब्स की भयानक कमी
टेस्टिंग लैब्स की स्थिति और भी खराब है। कई राज्यों में फंक्शनल ड्रग टेस्टिंग लैब्स ही नहीं हैं। जिनके पास हैं, वे बहुत कम टेस्ट करते हैं।
- इंप्योरिटी टेस्टिंग के लिए स्पेशल स्टैंडर्ड्स चाहिए – ये ज्यादातर विदेश से महंगे दाम पर आते हैं।
- आईपीसी भी सीमित इंप्योरिटी स्टैंडर्ड्स ही बनाती है।
- तेलंगाना (40% फार्मा आउटपुट) पिछले साल एक ही पब्लिक लैब पर निर्भर था।
- हिमाचल प्रदेश (ग्लोबल सप्लायर) की स्थिति भी लगभग वैसी ही।
प्राइवेट लैब्स हैं और NAB L एक्रेडिटेड भी हैं, लेकिन ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत टेस्ट रिपोर्ट तभी लीगल मानी जाती है जब गवर्नमेंट एनालिस्ट ने टेस्ट किया हो। प्राइवेट लैब्स को हर रिपोर्ट पर गवर्नमेंट स्टैंप चाहिए। इससे प्राइवेट प्लेयर्स में इंसेंटिव ही नहीं बनता।
लोन लाइसेंसिंग और अकाउंटेबिलिटी का संकट
लोन लाइसेंसिंग नाम का कॉन्सेप्ट और भी जटिलता पैदा करता है। कंपनी A के पास लाइसेंस होता है, लेकिन प्रोडक्शन कंपनी B की फैक्ट्री में होता है। यह कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग है।
- कई बार कंपनी A ऐसे राज्य में लाइसेंस लेती है जहां सप्लाई चेन नहीं है।
- अगर प्रॉब्लम होती है तो अकाउंटेबिलिटी तय करना मुश्किल हो जाता है।
- होस्ट स्टेट (जहां फैक्ट्री है) ही लाइसेंस रिवोक कर सकता है। दूसरे स्टेट्स में प्रोसेस ओवरसी नहीं कर सकते।
एक्सिपिएंट्स – सबसे बड़ा ब्लाइंड स्पॉट
हर दवा में दो हिस्से होते हैं:
- API (Active Pharmaceutical Ingredient) – असल में इलाज करता है।
- एक्सिपिएंट्स – फिलर्स, बाइंडर्स, सॉल्वेंट्स, फ्लेवरिंग एजेंट्स।
API पर बहुत फोकस है। लेकिन एक्सिपिएंट्स पर कम ध्यान। ये इंडस्ट्रियल केमिकल्स होते हैं और सस्ते सब्स्टीट्यूट (जैसे DEG, EG) मिल सकते हैं।
- 2022 के गांबिया हादसे में DEG और EG से 66 बच्चों की मौत हुई।
- लंबे समय तक DEG/EG टेस्टिंग मैंडेटरी नहीं थी।
- एक्सिपिएंट्स के स्टैंडर्ड्स सेंट्रल गवर्नमेंट सेट करती है, लेकिन स्पेसिफिक रेगुलेशंस कम हैं।
- ब्रांड्स को एक्सिपिएंट्स लेबल करने की मजबूरी नहीं थी।
टू-टियर्ड सिस्टम: एक्सपोर्ट vs डोमेस्टिक
ग्लोबल स्क्रूटनी बढ़ने के बाद एक्सपोर्ट दवाओं पर सख्ती हुई।
- कफ सिरप, बायोलॉजिक्स, वैक्सीन आदि अब सीधे CDSO के अंडर।
- लेकिन डोमेस्टिक मार्केट के लिए रूल्स में ज्यादा बदलाव नहीं।
यह टू-टियर्ड सिस्टम गलत इंसेंटिव्स पैदा करता है। एक्सपोर्ट बैच अच्छे बनते हैं, लेकिन डोमेस्टिक में कॉर्नर कटिंग हो सकती है।
निष्कर्ष
भारत का फार्मा सेक्टर दुनिया के लिए जीवनरक्षक है, लेकिन क्वालिटी टेस्टिंग में कमजोरी गंभीर खतरा है। अंडरस्टाफ्ड स्टेट FDA, लैब्स की कमी, लोन लाइसेंसिंग की जटिलता और एक्सिपिएंट्स पर कम ध्यान – ये सारी समस्याएं मिलकर खतरनाक दवाएं मार्केट में पहुंचा रही हैं।
भारत को अब एक्सपोर्ट और डोमेस्टिक दवाओं के लिए एक ही सख्त टेस्टिंग स्टैंडर्ड लाना होगा। स्टेट लैब्स की कैपेसिटी बढ़ानी होगी, इंस्पेक्टर्स की संख्या बढ़ानी होगी और एक्सिपिएंट्स पर भी API जितना फोकस करना होगा। तभी हम “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” का नाम सच्चाई से कायम रख पाएंगे।
FAQs
- भारत में ड्रग टेस्टिंग क्यों कमजोर है? स्टेट FDA अंडरस्टाफ्ड हैं, लैब्स कम हैं और इंस्पेक्शन शॉर्टफॉल 70-80% तक है।
- एक्सिपिएंट्स में समस्या क्यों ज्यादा है? API पर फोकस ज्यादा है, लेकिन एक्सिपिएंट्स (फिलर्स, सॉल्वेंट्स) पर कम स्क्रूटनी – DEG/EG जैसे टॉक्सिक सब्स्टीट्यूट मिल जाते हैं।
- लोन लाइसेंसिंग क्या समस्या पैदा करती है? लाइसेंस और प्रोडक्शन अलग-अलग राज्यों में – अकाउंटेबिलिटी तय करना मुश्किल।
- एक्सपोर्ट और डोमेस्टिक दवाओं में फर्क क्यों? एक्सपोर्ट पर CDSO सख्त है, लेकिन डोमेस्टिक पर स्टेट FDA कमजोर – टू-टियर्ड सिस्टम।
- क्या बदलाव जरूरी हैं? एक सिंगल सख्त स्टैंडर्ड, ज्यादा इंस्पेक्टर्स, लैब कैपेसिटी और एक्सिपिएंट्स पर फोकस।