कल्पना कीजिए कि 2020 में कोविड के दौरान शेयर मार्केट 40% गिर चुका था और अचानक चाइनीज सेंट्रल बैंक ने HDFC में 1% से ज्यादा स्टेक खरीद लिया। यह कोई छोटी खबर नहीं थी – यह भारत के फाइनेंशियल सिस्टम के दिल तक पहुंचने वाली चाल लग रही थी। सरकार ने तुरंत प्रेस नोट 3 जारी किया और पड़ोसी देशों (खासकर चीन) से आने वाले हर निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी। छह साल तक यह नीति सख्त रही। लेकिन अब यूनियन कैबिनेट ने इसमें पहला बड़ा रिलैक्सेशन मंजूर किया है।
क्या यह भारत-चीन रिश्तों में सुधार का संकेत है? या फिर भारत अब चाइनीज टेक्नोलॉजी और कैपिटल को चुनिंदा तरीके से बुला रहा है? आज हम प्रेस नोट 3 की पूरी कहानी, इसके रिलैक्सेशन और भारत के लिए इसके मतलब को समझेंगे।
प्रेस नोट 3 क्या था और क्यों लाया गया?
अप्रैल 2020 तक चीन से आने वाला निवेश अमेरिका या जापान की तरह फ्री था। लेकिन कोविड क्राइसिस में मार्केट क्रैश के दौरान चाइनीज इन्वेस्टर्स ने बहुत आक्रामक खरीदारी शुरू की। HDFC जैसे बड़े फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में चाइनीज स्टेक बढ़ने की खबर आई। सरकार को डर था कि चीन सस्ते भाव पर भारत के क्रिटिकल एसेट्स खरीदकर कंट्रोल हासिल कर सकता है।
प्रेस नोट 3 ने नियम बदला:
- पड़ोसी देशों (जिनके साथ लैंड बॉर्डर है) से आने वाले हर निवेश पर सरकारी अप्रूवल जरूरी।
- अगर किसी भी निवेश में “बेनिफिशियल ओनरशिप” चाइनीज एंटिटी की थोड़ी भी हिस्सेदारी थी तो अप्रूवल रूट से जाना पड़ता।
यह नीति मुख्य रूप से चीन को टारगेट करती थी। गलवान क्लैश के बाद यह और सख्त हो गई। लेकिन इसमें एक बड़ी कमी थी – “बेनिफिशियल ओनरशिप” की परिभाषा स्पष्ट नहीं थी।
प्रेस नोट 3 से क्या समस्याएं पैदा हुईं?
नीति का इरादा अच्छा था, लेकिन अमल में कई दिक्कतें आईं:
- अस्पष्ट परिभाषा – बैंक और निवेशक कन्फ्यूज थे कि कितना प्रतिशत चाइनीज ओनरशिप से अप्रूवल जरूरी है।
- बहुत सारे निवेश फंस गए – 2020 से 2024 तक 526 प्रपोजल में से सिर्फ 124 अप्रूव हुए। 200 से ज्यादा रिजेक्ट और बाकी पेंडिंग।
- ग्लोबल फंड्स प्रभावित – ब्लैक रॉक, कार्लाइल जैसे फंड्स में भी चाइनीज लिमिटेड पार्टनर्स होते हैं। ऐसे निवेश भी फंस गए।
- जॉइंट वेंचर में देरी – भारत को चाइनीज टेक्नोलॉजी की जरूरत थी, लेकिन अप्रूवल में 6-10 महीने या सालों लग जाते थे।
नतीजा: भारत को कैपिटल और टेक्नोलॉजी दोनों का नुकसान हो रहा था।
अब रिलैक्सेशन में क्या बदलाव आया है?
मार्च 2026 में कैबिनेट ने प्रेस नोट 3 में पहला बड़ा बदलाव मंजूर किया। मुख्य बातें:
- बेनिफिशियल ओनरशिप की नई परिभाषा – मनी लॉन्ड्रिंग लॉ के आधार पर। अगर किसी निवेश में पड़ोसी देश की 10% से कम हिस्सेदारी है और कंट्रोल नहीं है तो अप्रूवल की जरूरत नहीं।
- जॉइंट वेंचर के लिए फास्ट-ट्रैक – अगर भारतीय कंपनी जॉइंट वेंचर को कंट्रोल करती है तो अप्रूवल 60 दिनों में मिलेगा। यह रूट सात क्रिटिकल सेक्टर्स (एडवांस बैटरी, रेयर अर्थ, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि) के लिए है।
- स्पष्टता और बैलेंस – नीति अब चुनिंदा चाइनीज निवेश को रोकती है, लेकिन अच्छे टेक्नोलॉजी और कैपिटल वाले निवेश को आसान बनाती है।
यह बदलाव भारत को मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस बनाने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष
प्रेस नोट 3 ने 2020 में चीन से अनियंत्रित निवेश को रोका, लेकिन अस्पष्टता के कारण भारत को बहुत सारे अच्छे निवेश और टेक्नोलॉजी से वंचित होना पड़ा। अब 2026 में आए रिलैक्सेशन से सरकार ने मिडिल ग्राउंड ढूंढने की कोशिश की है – सुरक्षा बनाए रखते हुए जरूरी कैपिटल और नॉलेज को बुलाने की।
यह बदलाव दिखाता है कि पॉलिसी का इरादा जितना अच्छा हो, उसकी स्पष्टता और लचीलापन उतना ही जरूरी है। भारत को अब सावधानी से आगे बढ़ना होगा – न तो चीन पर पूरी तरह निर्भर होना है और न ही अच्छे निवेश को रोकना है।
की इनसाइट्स
- प्रेस नोट 3 ने 2020 में पड़ोसी देशों (मुख्य रूप से चीन) से निवेश पर सरकारी अप्रूवल अनिवार्य किया
- अस्पष्ट बेनिफिशियल ओनरशिप परिभाषा से 75% से ज्यादा प्रपोजल फंस गए या रिजेक्ट हुए
- 2026 में रिलैक्सेशन – 10% से कम चाइनीज ओनरशिप पर अप्रूवल जरूरी नहीं
- जॉइंट वेंचर के लिए फास्ट-ट्रैक अप्रूवल (60 दिन) – सात क्रिटिकल सेक्टर्स में
- भारत को चाइनीज टेक्नोलॉजी और कैपिटल की जरूरत – बैलेंस जरूरी
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- प्रेस नोट 3 क्या था? अप्रैल 2020 में लाया गया नियम जो पड़ोसी देशों (खासकर चीन) से निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य करता था।
- रिलैक्सेशन में क्या बड़ा बदलाव आया? बेनिफिशियल ओनरशिप की नई परिभाषा और क्रिटिकल सेक्टर्स में जॉइंट वेंचर के लिए 60 दिन में अप्रूवल।
- क्या यह चीन के लिए खुला दरवाजा है? नहीं – सख्त स्क्रूटनी बनी रहेगी। सिर्फ छोटे और गैर-कंट्रोलिंग स्टेक वाले निवेश आसान हुए हैं।
- भारत को क्या फायदा होगा? बैटरी, रेयर अर्थ और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में चाइनीज टेक्नोलॉजी और कैपिटल आ सकता है।
- क्या यह पॉलिसी अब भी चीन को टारगेट करती है? हां – लेकिन अब ज्यादा स्पष्ट और बैलेंस्ड तरीके से।