पिछले कुछ सालों से हर जगह यही सुनाई दे रहा है कि दुनिया की इकोनॉमी ठीक चल रही है, अनइंप्लॉयमेंट रेट हिस्टोरिकली कम है और लेबर मार्केट मजबूत है। लेकिन इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ) की नई 2026 रिपोर्ट इस सतही स्थिरता के नीचे छिपे गंभीर संकट को उजागर करती है।
रिपोर्ट कहती है कि 18.6 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, लेकिन असली समस्या इससे कहीं ज्यादा बड़ी है – जॉब गैप 40 करोड़ से पार है। इनफॉर्मल सेक्टर बढ़ रहा है, एजुकेटेड यूथ जॉब्स का इंतजार कर रहा है और मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स की जगह अब एआई और ऑटोमेशन ले रहे हैं। आज हम आईएलओ 2026 रिपोर्ट की मुख्य बातों को समझेंगे और देखेंगे कि यह भारत और पूरी दुनिया के लिए क्या मतलब रखती है।
अनइंप्लॉयमेंट के आंकड़े: सतह पर स्थिरता, नीचे संकट
दुनिया में फिलहाल अनइंप्लॉयमेंट रेट 5% से नीचे है – यह हिस्टोरिकली बहुत कम है। लेकिन आईएलओ का जॉब गैप नंबर ज्यादा चिंताजनक है। जॉब गैप में वे लोग शामिल हैं जो काम करना चाहते हैं लेकिन एक्टिवली जॉब नहीं ढूंढ रहे। यह संख्या 40 करोड़ से ज्यादा है।
मतलब हर 10 में से कम से कम 1 व्यक्ति काम चाहता है, लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा। यह स्थिरता सिर्फ सतह पर है – नीचे संरचनात्मक समस्याएं बढ़ रही हैं।
इनफॉर्मल सेक्टर का बढ़ता खतरा
पिछले 10 सालों में इनफॉर्मल सेक्टर का ग्रोथ रिवर्स हो गया है। 2005 से 2015 तक यह 2.2% कम हुआ था, लेकिन अब 2026 तक यह 210 करोड़ वर्कर्स तक पहुंच जाएगा।
- लो और मिडिल इनकम देशों में स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन रुक गया है
- हाई एजुकेशन वाले यूथ फॉर्मल जॉब्स का इंतजार करते हैं (36.6% तक अनइंप्लॉयमेंट)
- कम एजुकेशन वाले तुरंत इनफॉर्मल जॉब्स ले लेते हैं
नतीजा: 28.4 करोड़ वर्कर्स एक्सट्रीम पॉवर्टी में हैं, भले ही उनके पास जॉब हो।
हाई इनकम देशों की समस्या: यूथ की कमी
अमीर देशों में पॉपुलेशन तेजी से बूढ़ी हो रही है। वर्कफोर्स हर साल 0.1% नेगेटिव ग्रोथ कर रहा है। इससे इकोनॉमिक ग्रोथ 0.2% सालाना कम हो रहा है।
यहां समस्या जॉब्स की कमी नहीं – बल्कि स्किल्ड वर्कर्स की कमी है।
मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स का बदलता रोल
पिछले दशकों में गरीब देशों ने मैन्युफैक्चरिंग से विकास किया। लेकिन अब:
- ग्लोबल ट्रेड से दूरियां बढ़ रही हैं
- मैन्युफैक्चरिंग ऑटोमेट हो रही है
- कम वर्कर्स से ज्यादा प्रोडक्शन हो रहा है
नतीजा: लो स्किल जॉब्स कम हो रहे हैं। नए मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स अब सर्विस सेक्टर जैसे हैं – डिजाइन, डेटा एनालिसिस और रिसर्च पर फोकस।
एआई का प्रभाव: अभी डिसरप्शन नहीं, लेकिन वैकेंसीज रुकी हुई हैं
आईएलओ के अनुसार एआई ने अभी जॉब्स को फंडामेंटली नहीं बदला है। लेकिन बिजनेसेस एआई समझने में व्यस्त हैं, इसलिए हायरिंग और एक्सपेंशन रुकी हुई है।
एजुकेटेड यूथ पर सबसे ज्यादा असर – रूटीन टास्क्स (कोडिंग, ड्राफ्टिंग, डेटा वर्क) एआई कर रहा है। लॉन्ग टर्म में प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी, लेकिन शॉर्ट टर्म में वैकेंसीज कम हैं।
निष्कर्ष
आईएलओ 2026 रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल जॉब मार्केट सतह पर स्थिर दिख रहा है, लेकिन नीचे संकट गहरा रहा है। अनइंप्लॉयमेंट कम है, लेकिन जॉब गैप 40 करोड़ से ज्यादा है। इनफॉर्मल सेक्टर बढ़ रहा है, मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स कम हो रहे हैं और एआई वैकेंसीज रोक रहा है।
भारत जैसे देशों के लिए यह चेतावनी है – हमें स्किल्ड वर्कफोर्स, फॉर्मल सेक्टर और स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन पर फोकस करना होगा। वरना स्थिरता सिर्फ आंकड़ों में रहेगी, हकीकत में नहीं।
की इनसाइट्स
- ग्लोबल अनइंप्लॉयमेंट रेट 5% से नीचे, लेकिन जॉब गैप 40 करोड़ से ज्यादा
- इनफॉर्मल सेक्टर 2026 तक 210 करोड़ वर्कर्स तक पहुंचेगा
- लो इनकम देशों में एजुकेटेड यूथ का 36.6% अनइंप्लॉयमेंट
- मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स अब ऑटोमेट हो रहे हैं – लो स्किल रोजगार कम
- एआई ने जॉब्स नहीं छीने, लेकिन हायरिंग रुकी हुई है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- आईएलओ रिपोर्ट के अनुसार जॉब गैप क्या है? वे लोग जो काम करना चाहते हैं लेकिन एक्टिवली जॉब नहीं ढूंढ रहे – यह संख्या 40 करोड़ से ज्यादा है।
- इनफॉर्मल सेक्टर क्यों बढ़ रहा है? स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन रुक गया है और पॉपुलेशन हाई इनफॉर्मल वाले देशों में तेजी से बढ़ रही है।
- एआई का जॉब मार्केट पर असर क्या है? अभी जॉब्स नहीं छीने, लेकिन बिजनेसेस एआई समझने में व्यस्त हैं – वैकेंसीज और हायरिंग रुकी हुई है।
- हाई इनकम देशों की मुख्य समस्या क्या है? पॉपुलेशन तेजी से बूढ़ी हो रही है – वर्कफोर्स हर साल 0.1% कम हो रहा है।
- भारत के लिए क्या मतलब है? हमें स्किल्ड वर्कफोर्स और फॉर्मल सेक्टर पर फोकस करना होगा – वरना इनफॉर्मल सेक्टर बढ़ेगा।