India’s Mandatory CSR Law: 1.22 Lakh Crore Spent, But Is It Really Working
भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) एक अनोखा प्रयोग है। 2014 में कंपनी अधिनियम की धारा 135 के तहत बड़ी कंपनियों को अपने औसत मुनाफे का 2% हिस्सा सामाजिक कार्यों पर खर्च करना अनिवार्य कर दिया गया। पिछले 10 साल में इस कानून के तहत करीब 1.22 लाख करोड़ रुपये सामाजिक कारणों पर खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन सवाल ये है कि इतना बड़ा फंड समाज के असली जरूरतमंद लोगों तक पहुंच भी रहा है या नहीं?
आज हम इसी CSR कानून के बारे में विस्तार से बात करेंगे – यह कानून कैसे आया, किन कंपनियों पर लागू होता है, कहां पैसा जा रहा है और इसकी असल प्रभावशीलता क्या है।
CSR कानून की शुरुआत और लागू होना
भारत ने कॉर्पोरेट्स को सामाजिक जिम्मेदारी सौंपने की कोशिश पहले भी की थी, लेकिन 2014 में इसे कानूनी रूप दिया गया। इससे पहले 2009 और 2011 में सिर्फ गाइडलाइंस जारी की गई थीं, जिन्हें कंपनियां गंभीरता से नहीं ले रही थीं।
CSR कानून किन कंपनियों पर लागू होता है?
- नेट वर्थ 500 करोड़ रुपये से ज्यादा, या
- टर्नओवर 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा, या
- नेट प्रॉफिट 5 करोड़ रुपये से ज्यादा
इनमें से कोई एक शर्त पूरी होने पर कंपनी को पिछले तीन साल के औसत नेट प्रॉफिट का 2% शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, भूख मिटाने जैसे सामाजिक कार्यों पर खर्च करना पड़ता है। 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च करने वाली कंपनियों को CSR कमेटी भी बनानी पड़ती है।
CSR कानून के परिणाम: उपलब्धियां और समस्याएं
इस कानून के बाद CSR खर्च में काफी बढ़ोतरी हुई है। FY24 में अकेले 19,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। FY15 से FY25 के बीच CSR खर्च प्रॉफिट का औसत 1.8% से बढ़कर 2.65% हो गया है। कोविड काल में भी इस फंड से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7,000 करोड़ रुपये लगाए गए।
लेकिन कुछ बड़ी समस्याएं भी सामने आई हैं:
- भौगोलिक असमानता: कुल CSR खर्च का 34% सिर्फ महाराष्ट्र और 12% दिल्ली में जा रहा है। टॉप 10 राज्यों में 95% पैसा खर्च होता है, जबकि पिछड़े इलाकों में सिर्फ 12% ही पहुंच पाता है।
- इन-हाउस फाउंडेशन ट्रेंड: कंपनियां अब NGO के बजाय अपने खुद के फाउंडेशन के जरिए पैसा खर्च कर रही हैं, जिससे पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
- कंपनियों का व्यवहार: कई कंपनियां अब सिर्फ 2% खर्च करके चुकती कर रही हैं, जबकि पहले voluntarily 10% तक खर्च करती थीं।
CSR कानून कंपनियों पर क्या असर डाल रहा है?
यह कानून कंपनियों के लिए अब एक fixed cost बन गया है। पहले CSR discretionary खर्च था, अब अनिवार्य होने से ऑपरेटिंग लीवरेज बढ़ गया है। इससे कंपनियों का systematic risk (बीटा) 8% बढ़ गया है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि CSR अनिवार्य होने के बाद कंपनियों का ROE और ROAE गिरा है।
कुछ कंपनियां CSR से बचने के लिए R&D खर्च बढ़ा रही हैं या conservative accounting अपना रही हैं ताकि नेट प्रॉफिट कम दिखे।
Key Insights
- पिछले 10 साल में CSR के तहत 1.22 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए
- 95% खर्च सिर्फ टॉप 10 राज्यों में
- कंपनियां voluntarily CSR कम कर रही हैं
- कानून ने मात्रा तो बढ़ाई लेकिन गुणवत्ता पर असर पड़ा
- CSR अब कंपनियों के लिए fixed obligation बन गया है
निष्कर्ष
भारत का CSR कानून दुनिया में अनोखा है, जिसने सामाजिक क्षेत्र में भारी फंडिंग की है। लेकिन भौगोलिक असमानता, खर्च की गुणवत्ता और कंपनियों पर बढ़ते बोझ ने इसकी असरदारी को सीमित कर दिया है। अगर इसे और बेहतर तरीके से लागू किया जाए और पैसा वाकई पिछड़े इलाकों तक पहुंचे, तो यह समाज के लिए game changer साबित हो सकता है।
FAQs
- CSR कानून भारत में कब लागू हुआ?
अप्रैल 2014 में कंपनी अधिनियम की धारा 135 के तहत लागू हुआ। - CSR खर्च कितना करना अनिवार्य है?
पिछले तीन साल के औसत नेट प्रॉफिट का 2%। - CSR का सबसे ज्यादा पैसा कहां खर्च हो रहा है?
महाराष्ट्र (34%) और दिल्ली (12%) में। - CSR अनिवार्य होने से कंपनियों को क्या नुकसान हुआ?
Systematic risk बढ़ा, ROE गिरा और कुछ कंपनियां खर्च कम करने के तरीके ढूंढ रही हैं। - CSR कानून कितना सफल रहा है?
मात्रा में सफल लेकिन गुणवत्ता और सही पहुंच में अभी चुनौतियां बाकी हैं।