Green Hydrogen का सपना: क्यों धीमा है प्रोग्रेस और भारत की क्या भूमिका?

Green Hydrogen Challenges and India’s Role in 2026

पिछले कुछ सालों से हाइड्रोजन को फॉसिल फ्यूल्स का सबसे बड़ा विकल्प माना जा रहा है। खासकर ग्रीन हाइड्रोजन, जो रिन्यूएबल एनर्जी से बनता है, को क्लीन एनर्जी क्रांति का भविष्य बताया जा रहा है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। हाइड्रोजन प्रोडक्शन अभी भी ज्यादातर फॉसिल फ्यूल्स पर निर्भर है और ग्रीन हाइड्रोजन का स्केल अभी बहुत छोटा है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में इस स्थिति को साफ-साफ बताया है। आज हम इसी रिपोर्ट के आधार पर समझेंगे कि हाइड्रोजन प्रोडक्शन की वर्तमान स्थिति क्या है, इसके सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं और भारत इस स्पेस में क्या भूमिका निभा सकता है।

हाइड्रोजन प्रोडक्शन की वर्तमान स्थिति

2024 में दुनिया भर में लगभग 100 मिलियन टन हाइड्रोजन का उपयोग हुआ। लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा उन्हीं सेक्टर्स में गया जहां हाइड्रोजन पहले से इस्तेमाल होता रहा है – जैसे ऑयल रिफाइनिंग, फर्टिलाइजर मैन्युफैक्चरिंग और मेथेनॉल प्रोडक्शन।

एनर्जी प्रोडक्शन के लिए हाइड्रोजन का उपयोग अभी भी बहुत कम है। सबसे बड़ी समस्या प्रोडक्शन की एफिशिएंसी है। पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर्स का उपयोग किया जाता है। इसमें करीब एक तिहाई बिजली बर्बाद हो जाती है। उसके बाद हाइड्रोजन को ट्रांसपोर्ट करने के लिए कंप्रेशन, कूलिंग या अमोनिया में बदलने में और एनर्जी लगती है। अगर इसे फ्यूल सेल में बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो और 40% एनर्जी लॉस हो जाता है।

नतीजा? पूरी प्रक्रिया के अंत में सिर्फ 30-40% एनर्जी बचती है। फॉसिल फ्यूल से बनी ट्रेडिशनल बिजली इससे ज्यादा एफिशिएंट है। इसलिए रोजमर्रा के उपयोग – जैसे कारों या घरों में – हाइड्रोजन अभी फायदेमंद नहीं है।

ग्रीन हाइड्रोजन की चुनौतियां

ग्रीन हाइड्रोजन की स्थिति और भी मुश्किल है। IEA की रिपोर्ट बताती है कि हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स तेजी से फेल हो रहे हैं। 2024 में सिर्फ 1.7 मिलियन टन हाइड्रोजन के लिए नए ऑफटेक एग्रीमेंट्स साइन हुए, और उनमें भी सिर्फ 20% लीगली बाइंडिंग थे।

प्रोजेक्ट्स कैंसल होने के मुख्य कारण हैं:

  • गारंटीड कस्टमर्स की कमी
  • रेगुलेटरी इश्यूज (स्लो परमिट्स, अनक्लियर रूल्स)
  • फंडिंग की कमी

कई प्रोजेक्ट्स शुरुआती स्टेज में ही रुक गए क्योंकि बायर्स नहीं मिल रहे थे।

चीन का दबदबा और भारत का रोल

चीन इस स्पेस में सबसे आगे है। दुनिया के इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग का 60% और इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का लगभग 50% चीन के पास है। सस्ती बिजली और मजबूत सप्लाई चेन के कारण चीन में ग्रीन हाइड्रोजन 40-45% सस्ती बनाई जा सकती है।

भारत भी इस क्षेत्र में सक्रिय है। IEA की रिपोर्ट में भारत उन देशों में शामिल है जिनके पास सीरियस नेशनल हाइड्रोजन प्रोग्राम है। भारत हाइड्रोजन को रिफाइनरीज और फर्टिलाइजर प्लांट्स में इस्तेमाल कर रहा है। IOC और BPCL जैसे ऑयल रिफाइनर्स ग्रीन हाइड्रोजन खरीदने के लिए बोली लगा रहे हैं।

सरकार इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है और कुछ राज्यों में सब्सिडी भी दे रही है। इससे चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

की इनसाइट्स

  • 2024 में 100 मिलियन टन हाइड्रोजन का उपयोग हुआ, लेकिन ज्यादातर पुराने सेक्टर्स में
  • ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स तेजी से फेल हो रहे हैं
  • चीन इलेक्ट्रोलाइजर और ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन में ग्लोबल लीडर है
  • भारत रिफाइनिंग और फर्टिलाइजर सेक्टर में हाइड्रोजन इस्तेमाल बढ़ा रहा है
  • हाइड्रोजन का बड़े पैमाने पर एडॉप्शन अभी चुनौतीपूर्ण है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

  1. ग्रीन हाइड्रोजन क्या है? यह रिन्यूएबल एनर्जी (सोलर या विंड) से बनी हाइड्रोजन है, जिसमें कार्बन एमिशन लगभग शून्य होता है।
  2. हाइड्रोजन प्रोडक्शन में सबसे बड़ी समस्या क्या है? बहुत ज्यादा एनर्जी लॉस, महंगा प्रोडक्शन और गारंटीड कस्टमर्स की कमी।
  3. भारत ग्रीन हाइड्रोजन में क्या कर रहा है? भारत रिफाइनिंग और फर्टिलाइजर प्लांट्स में हाइड्रोजन इस्तेमाल बढ़ा रहा है और इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन दे रहा है।
  4. क्या हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल का अच्छा विकल्प है? अभी नहीं, क्योंकि प्रोडक्शन बहुत महंगा और इनएफिशिएंट है।
  5. चीन हाइड्रोजन में आगे क्यों है? सस्ती बिजली, मजबूत सप्लाई चेन और बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन क्षमता के कारण।

निष्कर्ष ग्रीन हाइड्रोजन को फॉसिल फ्यूल्स का क्लीन विकल्प माना जा रहा है, लेकिन IEA की रिपोर्ट साफ बताती है कि प्रोडक्शन अभी बहुत महंगा, इनएफिशिएंट और डिमांड की कमी वाला है। चीन इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जबकि भारत भी अपनी रणनीति बना रहा है।

अगर भारत इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग और डिमांड क्रिएशन पर फोकस करे तो वह इस उभरते क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ग्रीन हाइड्रोजन का भविष्य अभी अनिश्चित है, लेकिन सही नीतियों और निवेश के साथ भारत इसमें मजबूत स्थिति बना सकता है।

आपको क्या लगता है? क्या ग्रीन हाइड्रोजन वाकई फॉसिल फ्यूल्स का विकल्प बन पाएगा? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।

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