भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खाद (फर्टिलाइजर) केवल एक कृषि उत्पाद नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। हर साल सरकार आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य दोहराती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में फर्टिलाइजर आयात लगातार बढ़ रहा है। बढ़ती आबादी, अधिक उत्पादन की जरूरत और सीमित प्राकृतिक संसाधनों के कारण यह चुनौती और जटिल होती जा रही है। हाल के वर्षों में उर्वरक आयात बिल अरबों डॉलर तक पहुँच गया है, जो देश की आर्थिक संरचना पर भी असर डालता है।
सरकार किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित कर रही है और प्रधानमंत्री Narendra Modi भी कई बार आत्मनिर्भर कृषि की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं। फिर भी सवाल वही है—आखिर भारत उर्वरकों में आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पा रहा?
भारत में फर्टिलाइजर आयात का मूल कारण
भारत में उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन सीमित है। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए फसलों को तीन प्रमुख पोषक तत्वों की जरूरत होती है:
- नाइट्रोजन (N) – मुख्य स्रोत: यूरिया
- फास्फोरस (P) – मुख्य स्रोत: डीएपी
- पोटैशियम (K) – मुख्य स्रोत: एमओपी
इन तीनों को मिलाकर NPK अनुपात कहा जाता है। भारत के लिए आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, लेकिन वास्तविक उपयोग इससे काफी असंतुलित है, जिससे आयात निर्भरता बढ़ती जा रही है।
यूरिया: सबसे ज्यादा उपयोग, सबसे बड़ी चुनौती
भारत में कुल उर्वरक उपयोग का लगभग 50–60% हिस्सा यूरिया का है। इसका मुख्य कारण इसकी कम कीमत है, क्योंकि सरकार भारी सब्सिडी देती है। किसानों को यूरिया बहुत सस्ता मिलता है, जबकि डीएपी और एमओपी महंगे हैं।
यूरिया से जुड़ी मुख्य समस्याएँ:
- सब्सिडी के कारण अत्यधिक उपयोग
- उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर निर्भरता
- गैस का बड़ा हिस्सा आयातित
- मिट्टी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव
जब यूरिया का अधिक उपयोग होता है तो मिट्टी की उर्वरता घटती है और नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा व्यर्थ चला जाता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और आयात पर दबाव भी।
डीएपी: कच्चे माल की कमी से आयात निर्भरता
डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) भारत में दूसरा सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला उर्वरक है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या है—रॉक फॉस्फेट की कमी। भारत अपनी जरूरत का लगभग 55–60% डीएपी आयात करता है।
डीएपी आयात के प्रमुख कारण:
- घरेलू रॉक फॉस्फेट भंडार सीमित
- उत्पादन लागत अधिक
- वैश्विक बाजार पर निर्भरता
- जियोपॉलिटिकल जोखिम
जब वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है, तो डीएपी की कीमत तुरंत बढ़ जाती है और इसका असर सीधे किसानों पर पड़ता है।
एमओपी: 100% आयात पर निर्भरता
एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) के मामले में स्थिति और गंभीर है। भारत में पोटाश के व्यावसायिक भंडार लगभग नहीं हैं, इसलिए एमओपी पूरी तरह आयात पर निर्भर है।
इसका असर:
- किसानों द्वारा कम उपयोग
- NPK अनुपात असंतुलित
- आयात बिल में वृद्धि
हालांकि कुल उपयोग में एमओपी का हिस्सा कम है, लेकिन आयात खर्च में इसका योगदान काफी बड़ा है।
सब्सिडी सिस्टम और असंतुलित उपयोग
भारत सरकार उर्वरकों पर भारी सब्सिडी देती है। एक वित्तीय वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का बड़ा हिस्सा केवल यूरिया पर खर्च होता है। इससे किसानों का झुकाव यूरिया की ओर अधिक हो जाता है।
सब्सिडी का प्रभाव:
- यूरिया का ओवरयूज
- मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट
- अन्य उर्वरकों का कम उपयोग
- आयात निर्भरता में वृद्धि
सरकार सीधे सब्सिडी हटाने का जोखिम नहीं ले सकती क्योंकि इससे खाद्य उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
आत्मनिर्भर बनने के लिए सरकारी रणनीतियाँ
भारत सरकार उर्वरक आयात कम करने के लिए कई नई तकनीकों और योजनाओं पर काम कर रही है।
1. नैनो फर्टिलाइजर
नैनो यूरिया और नैनो डीएपी कम मात्रा में अधिक प्रभाव देते हैं। इससे:
- लागत कम होती है
- आयात घट सकता है
- मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है
2. ऑर्गेनिक और प्राकृतिक खेती
रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
3. पीएम प्रणाम योजना
राज्यों को रासायनिक उर्वरक उपयोग कम करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
4. पोटाश के विकल्प
शुगर उद्योग के उप-उत्पाद से बने पोटाश विकल्प विकसित किए जा रहे हैं।
Key Insights: समस्या का असली समाधान क्या है?
- संतुलित NPK उपयोग आवश्यक
- उर्वरक सब्सिडी संरचना में सुधार
- नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाना
- घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना
- आयात स्रोतों का विविधीकरण
कृषि और खाद्य सुरक्षा का भविष्य
भारत में हर राज्य की मिट्टी और फसल अलग है, इसलिए एक समान समाधान संभव नहीं। छोटे किसानों के लिए नई तकनीक अपनाना जोखिम भरा होता है, इसलिए जागरूकता और भरोसा दोनों जरूरी हैं।
ग्रीन रिवोल्यूशन के प्रमुख वैज्ञानिक M. S. Swaminathan ने कहा था कि यदि कृषि असफल होती है तो अर्थव्यवस्था भी स्थिर नहीं रह सकती। यही कारण है कि उर्वरक नीति केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है।
Conclusion: भारत में फर्टिलाइजर आयात कम करना क्यों जरूरी है
स्पष्ट है कि भारत में फर्टिलाइजर आयात बढ़ने के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं—कच्चे माल की कमी, सब्सिडी असंतुलन और तकनीकी सीमाएँ। हालांकि नैनो फर्टिलाइजर और प्राकृतिक खेती जैसे समाधान उम्मीद जगाते हैं, लेकिन आत्मनिर्भरता एक लंबी प्रक्रिया है। संतुलित उर्वरक उपयोग और तकनीकी नवाचार ही भविष्य में भारत को इस चुनौती से बाहर निकाल सकते हैं।
FAQs
1. भारत में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला फर्टिलाइजर कौन सा है?
यूरिया भारत में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला उर्वरक है।
2. भारत फर्टिलाइजर आयात पर इतना निर्भर क्यों है?
कच्चे माल की कमी और बढ़ती मांग इसके मुख्य कारण हैं।
3. NPK अनुपात क्या होता है?
यह नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम का संतुलित अनुपात है।
4. नैनो यूरिया क्या है?
यह नई तकनीक का उर्वरक है जो कम मात्रा में अधिक प्रभाव देता है।
5. क्या भारत फर्टिलाइजर में आत्मनिर्भर बन सकता है?
तकनीक और नीति सुधार से यह संभव है, लेकिन इसमें समय लगेगा।