टोबैको यूज में बढ़ोतरी 2025: भारत में गुटखा-सिगरेट क्यों बढ़ रहे हैं? | Tobacco Use Rise 2025: Why Gutkha and Cigarettes Are Increasing in India?

भारत में पिछले कुछ सालों से टोबैको के खिलाफ जागरूकता अभियान चल रहे हैं। GST बढ़ाया गया, पैकेट पर बड़े-बड़े हेल्थ वार्निंग लगाए गए, कई राज्यों में गुटखा बैन किया गया। फिर भी 2023-24 के हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे (HCES) ने चौंकाने वाला खुलासा किया है – टोबैको पर खर्च बढ़ रहा है।

रूरल भारत में टोबैको पर प्रति व्यक्ति खर्च 58% और अर्बन में 77% तक बढ़ा है। रूरल हाउसहोल्ड्स में गुटखा कंज्यूम करने वाले घरों की संख्या 6 गुना बढ़ गई है। क्या हम टोबैको से लड़ाई जीत रहे हैं या हार रहे हैं? आज हम इसकी पूरी सच्चाई समझेंगे।

हेल्थ सर्वे vs एक्सपेंडिचर सर्वे: दोनों डेटा में अंतर क्यों?

पिछले कुछ सालों में दो बड़े सर्वे हुए – GATS और NFHS-5 ने टोबैको यूज में गिरावट दिखाई। लेकिन HCES 2023-24 ने उल्टा दिखाया।

  • GATS और NFHS-5 में लोग खुद से पूछा जाता है – “क्या आप टोबैको यूज करते हैं?”
  • HCES में पूछा जाता है – “पिछले 7 दिनों में टोबैको पर कितना खर्च किया?”

दोनों अलग चीजें मापते हैं। लोग हेल्थ सर्वे में शर्मिंदगी के कारण “नहीं” कह सकते हैं, लेकिन खर्च का रिकॉर्ड छिप नहीं पाता।

HCES में भी बदलाव हुआ:

  • पहले एक ही विजिट में पूरा सर्वे – लोग थककर टोबैको पर कम रिपोर्ट करते थे
  • अब तीन विजिट और टैबलेट से रियल-टाइम वैलिडेशन – ज्यादा सटीक डेटा

इसलिए टोबैको यूज में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा सर्वे मेथड के सुधार से भी है। लेकिन पूरी कहानी यह नहीं है।

गुटखा का रूरल भारत में 6 गुना बढ़ना: सबसे बड़ा झटका

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा – रूरल हाउसहोल्ड्स में गुटखा कंज्यूम करने वाले घर 6 गुना बढ़े।

  • मध्य प्रदेश में 62% रूरल हाउसहोल्ड्स गुटखा यूज करते हैं
  • उत्तर प्रदेश में हर दूसरे घर में गुटखा खरीदा जाता है
  • गुटखा अब टोबैको एक्सपेंडिचर का 41% हिस्सा ले रहा है

2012 से ज्यादातर राज्यों में गुटखा बैन है। फिर यह बढ़ कैसे रहा है?

ट्विन सैची लूपहोल – मैन्युफैक्चरर्स ने पान मसाला और टोबैको अलग-अलग पाउच में बेचना शुरू किया। कंज्यूमर खुद मिलाकर गुटखा बना लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में इसे रोका था, लेकिन 10 साल बाद भी यह खुलेआम चल रहा है।

टैक्स का खेल – छोटे पाउच (10 ग्राम से कम) पर कोई MRP नहीं छपता, तो एक्साइज ड्यूटी भी नहीं लगती। लाखों ₹5 के सैची बिकते हैं – बिना टैक्स।

सिगरेट और बीड़ी का ट्रेंड: अमीर-गरीब का फर्क

  • रूरल में बीड़ी का शेयर 27% से घटकर 23% हुआ – गुटखा ने जगह ली
  • अर्बन में सिगरेट डबल से ज्यादा बढ़े – 18% हाउसहोल्ड्स यूज करते हैं
  • सबसे अमीर 20% हाउसहोल्ड्स में सिगरेट सबसे ज्यादा यूज होता है

जैसे-जैसे इनकम बढ़ती है, लोग सस्ते प्रोडक्ट (बीड़ी, गुटखा) छोड़कर महंगे (सिगरेट) की ओर जाते हैं।

2026 टैक्स चेंजेस: क्या यह संकट खत्म करेगा?

2025-26 में टोबैको पर टैक्स में बड़े बदलाव आए:

  • चिंग टोबैको पर एक्साइज 25% से 100% तक बढ़ी
  • लंबी सिगरेट्स पर प्रति स्टिक ड्यूटी ₹1,000 प्रति 1000 स्टिक्स तक
  • गुटखा कंपोनेंट्स पर कैपेसिटी बेस्ड टैक्स – पैकिंग मशीनें रजिस्टर करनी होंगी
  • हर साइज के पाउच पर MRP अनिवार्य – ₹5 वाला सैची भी टैक्स में आएगा

GST में भी बदलाव – अब रेवेन्यू स्टेट्स के साथ शेयर होगा। इससे स्टेट्स को भी इनफोर्समेंट का इंसेंटिव मिलेगा।

निष्कर्ष

टोबैको यूज में बढ़ोतरी का डेटा चौंकाने वाला है। गुटखा रूरल भारत में 6 गुना बढ़ा, सिगरेट अमीरों में तेजी से फैल रहा है। सर्वे मेथड में सुधार से कुछ संख्या बढ़ी, लेकिन असल में ट्विन सैची लूपहोल और टैक्स छूट ने इसे बढ़ावा दिया।

टोबैको अब सिर्फ हेल्थ प्रॉब्लम नहीं – यह गरीबी, भूख और शिक्षा पर भी असर डाल रहा है। भारत को टोबैको से लड़ाई और मजबूत करनी होगी – तभी हम 13.5 लाख सालाना मौतों को रोक पाएंगे।

की इनसाइट्स

  • रूरल में गुटखा कंज्यूम करने वाले हाउसहोल्ड्स 6 गुना बढ़े
  • टोबैको पर प्रति व्यक्ति खर्च रूरल में 58%, अर्बन में 77% बढ़ा
  • ट्विन सैची लूपहोल से बैन के बावजूद गुटखा बिक रहा है
  • 2026 में चिंग टोबैको पर 100% एक्साइज, MRP अनिवार्य
  • टोबैको से सालाना 1.8 लाख करोड़ का इकोनॉमिक बर्डन

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

  1. टोबैको यूज बढ़ने का मुख्य कारण क्या है? ट्विन सैची लूपहोल और टैक्स छूट – बैन के बावजूद गुटखा सस्ता और उपलब्ध।
  2. सर्वे में अंतर क्यों आया? GATS/NFHS सेल्फ-रिपोर्टेड है, HCES खर्च पर आधारित – ज्यादा सटीक।
  3. 2026 टैक्स चेंजेस क्या हैं? चिंग टोबैको पर 100% एक्साइज, छोटे पाउच पर MRP अनिवार्य, कैपेसिटी टैक्स।
  4. गुटखा रूरल में इतना क्यों बढ़ रहा है? सस्ता (₹5), भूख कम करता है, लंबे शिफ्ट में मजदूरों का सहारा।
  5. टोबैको से भारत को कितना नुकसान है? सालाना 13.5 लाख मौतें और 1.8 लाख करोड़ का इकोनॉमिक बर्डन।

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